बचपन में एक बहुत महशूर पंक्ति सुनी थी कि मुंबई सपनों का शहर है। यहां लोग अपने सपनों को हकीकत में बदलने आते हैं। पर पिछले कुछ समय से इस शहर ने उत्तर भारतीय राज्यों के लोगों के साथ जो र्दुव्यवहार किया है, उसे देखते हुऐ तो यह लगता है कि अब गैर मुंबईवासियों के लिये सिर्फ डरावने सपनों का शहर बनकर रह गया है।
पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर हमलों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। बीते शनिवार को ही सेंट्रल मुंबई में कुछ लोगों ने पांच टैक्सियों पर हमला करके उन्हें शतिग्रस्त कर दिया। बताया जा रहा है कि कुछ मोटर साइकिल सवारों ने पहले टैक्सी मालिकों से पूछा कि वे कहां से ताल्लुक रखते हैं। उनके यह बताये जाने पर कि वे उत्तर भारत से ताल्लुक रखते हैं उनकी टैक्सियों पर हमला करके उन्हें चकनाचूर कर दिया गया।
मुझे समझ नहीं आता कि अचानक से मुंबई क्षेत्रवाद क्यों करने लगी? इतने सालों से बाहर से लोग यहां आकर अपनी रोजी-रोटी का उपाय कर रहे हैं। पर अचानक से मुंबईवालों का ऐसा क्यों लगने लगा कि मुंबई सिर्फ उनकी जागीर है। क्या मुंबई को इस मुकाम तक पहुंचाने मे सिर्फ उनका का ही एकमात्र योगदान है?
सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि कोई भी व्यक्ति अगर अपना घर छोड़कर मीलों दूर रोजी-रोटी का साधन ढ़ूंढने आता है तो उसके पीछे उसकी मर्जी से ज्यादा मजबूरी होती है। ताकि हजारों मील दूर बैठा उनका परिवार चैन की रोटी खा सके। क्या उनके मन में अपने परिवार से मिलने की कसक नहीं उठती होगी। एक तो परिवार से दूरी का गम और उस पर दूसरे राज्य में भी परायों सा व्यवहार। मुंबई इतनी कठोर कैसे हो सकती है? बल्कि उसे तो चाहिये कि वह दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों को अपनेपन का अहसास दिलाये ताकि उन्हें कभी अपने घरों से दूर होने का एहसास ना हो। अगर सारे राज्य दूसरे राज्यों से आये लोगों को अपना दुश्मन समझकर उनके साथ र्दुव्यवहार करने लगे तो देश की अखण्डता चूर-चूर हो जायेगी। और इसके जिम्मेदार होगें हम स्वयं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
रविवार, 30 मार्च 2008
शुक्रवार, 28 मार्च 2008
कृषि प्रधान देश में असहाय कृषक
अगर किताबों और आंकड़ों की बात करें तो भारत की पहचानं कृषि प्रधान देश के रूप में की जाती है। परन्तु अगर कृषि प्रधान देश के किसान सरकार की उपेक्षा के शिकार और ऋणग्रस्त होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हों तो यह उस देश के लिये बड़ा ही शर्मनाक और शोचनीय विषय है।
उससे भी ज्यादा सोचने का मुद्दा यह है कि वह किसान तो मौत को गले लगाकर मुक्ति पा लेते हैं परन्तु उनके पीछे उस परिवार की स्थिति क्या होती होगी ,इस बात का अंदाजा लगाना ही बहुत कठिन है। जिस परिवार का मुखिया उन्हें कर्ज तले दबा छोड़ गया हो, जिनके पास गरीबी और अभाव ही उनकी पूंजी और पुश्तैनी विरासत रह गयी हो। उस परिवार के बारे में शायद ही कोई सोचता होगा।
हमारे देश में समपन्नता और विपन्नता के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। एक ओर है घोर दुर्गति और वहीं दूसरी ओर है आराम देह जिन्दगी। हांलाकि इस बार के बजट में सरकार ने आर्थिक पैकेज देकर किसानों को इस संकट से उबारने की जो घोषणा की है, वह प्रंशसनीय है। परन्तु इस बात का भी एक दुखद पक्ष यह है कि सरकार ने किसानों के लिये ऋणमाफी की जो घोषणा की है वह सिर्फ उन बड़े किसानों के लिये फायदेमंद है जिन्होने बैंक से ऋण लिया है। परन्तु आत्महत्या करने वाले किसानों मे उन किसानों की संख्या अधिक है जिन्होने साहूकारों से ऊंची दरों पर कर्जा लिया है और अब चुकाने में असमर्थ हैं। उनके लिये सरकार की ऋणमाफी की योजना अर्थहीन है, जबकि उन्हें ही सबसे अधिक सहायता की आवयश्कता है।
सरकार को चाहिये कि वह ऐसे किसानों को बैंक से बिना ब्याज के या फिर कम दर पर ऋण उपलब्ध कराये ताकि वे साहूकारों का कर्जा चुका पाऐं। जहां सरकार 60 हजार करोड़ का नुकसान उठा रही है वहीं थोड़े और नुकसान का जिम्मा लिया जा सकता है। अन्यथा सरकार के कर्जमाफी के पश्चात भी ये आत्महत्याओं का सिलसिला नहीं रूकेगा। और ना ही उनके परिवार की दुर्गति होने से कोई रोक पाऐगा।
मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008
जोधा अकबर - इतिहास का एक अनछुआ पहलू
सबसे पहले तो मैं क्षमा प्रार्थी हूं कि इतने दिनों से ब्लाग की दुनिया से दूर रही। इतने दिनों से अपनी लेखनी पर विराम लगा कर मैं स्वयं को बहुत बंधा हुआ महसूस कर रही थी। पर कुछ निजी कारणों से मैं अपने ब्लाग को कुछ नया नहीं दे पा रही थी। इसी बीच आशुतोष गोवारिकर की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘जोधा-अकबर’ देखने का मौका मिला। काफी दिनों बाद किसी फिल्म में मुझे अपने इतिहास को करीब से जानने का मौका मिला। फिल्म को देखने के बाद महसूस किया कि हमारे भारत का इतिहास कितना गहरा है। मन किया फिर से अपने इतिहास के पन्नों को टटोल कर देखा जाये।
यह फिल्म रिलीज से पहले से ही अपनी लागत और कहानी को लेकर चर्चा का विषय रही। परन्तु फिल्म को देखकर इसमें आयी लागत का अनुमान लगाना सरल है। पर सबसे मुख्य और आवश्यक वस्तु फिल्म की कहानी रही। सबसे पहले तो मैँ आशुतोष की हिम्मत की सराहना करना चाहूंगी क्योंकि भारत जैसे बहुसामप्रदायिक देश में किसी ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनाना एक जोखिम भरा काम है। क्योंकि फिल्म की विषय वस्तु के साथ अगर जरा भी छेड़छाड़ हुई तो कुछ विशेष लोग जिन्होने समाज में धर्म और जाति का ठेका ले रखा है, सड़कों पर उतरकर विरोध प्रर्दशन करने में जरा भी देर नहीं लगाते।
परन्तु इतनी सावधानियों को बरतने के बावजूद भी राजस्थान के लोगों ने अकबर जोधा के रिश्ते को लेकर भ्रम पैदा किया। वहां के लोगों के अनुसार जोधा अकबर की पत्नी नहीं बहू थी। इस कारण उन्हें इस फिल्म से आपत्ति थी। पर सोचनीय बात यह है कि क्या आशुतोष ने इतनी बड़ी फिल्म का निर्माण करने से पहले इतनी जरूरी बात का ध्यान नहीं रखा होगा।
खैर, यह तो होना ही था। कोई भी बड़ी फिल्म बिना विवादों के घेरे से नहीं बच सकती। परन्तु यहां पर यह बताना भी बहुत जरूरी है कि फिल्म के जुड़े हर व्यक्ति ने अपना काम पूरी ईमानदारी से निभाया है। जोधा और अकबर के पहनाऐ गये आभूषणों और वेष भूषा का भी खासा ध्यान रखा गया है।
फिल्म का दूसरा मुख्य आर्कषण का केन्द्र इसका संगीत है। जो कि आजकल के भड़कीले और शोर शराबे वाले संगीत से बिल्कुल अलग है। इसके गीत शान्त और सकून देने वाले हैं। फिल्म का एक गाना ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा’ तो मजहब की दीवारों से ऊपर है और सकून भरा है।
इस फिल्म से जुड़ी हर बात प्रशंसा के काबिल है। इस फिल्म को देखकर अपने इतिहास के कई पहलुओं से रूबरू होने का मौका मिला। हम तो यही उम्मीद करते हैं कि हमारे बालीवुड के निर्देशक इस तरह की विषय वस्तु पर फिल्म बनाते रहें, ताकि आगे आने वाली पीढ़ी समय दर समय अपने सुनहरे इतिहास से मुखातिब हो सके।
यह फिल्म रिलीज से पहले से ही अपनी लागत और कहानी को लेकर चर्चा का विषय रही। परन्तु फिल्म को देखकर इसमें आयी लागत का अनुमान लगाना सरल है। पर सबसे मुख्य और आवश्यक वस्तु फिल्म की कहानी रही। सबसे पहले तो मैँ आशुतोष की हिम्मत की सराहना करना चाहूंगी क्योंकि भारत जैसे बहुसामप्रदायिक देश में किसी ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनाना एक जोखिम भरा काम है। क्योंकि फिल्म की विषय वस्तु के साथ अगर जरा भी छेड़छाड़ हुई तो कुछ विशेष लोग जिन्होने समाज में धर्म और जाति का ठेका ले रखा है, सड़कों पर उतरकर विरोध प्रर्दशन करने में जरा भी देर नहीं लगाते।
परन्तु इतनी सावधानियों को बरतने के बावजूद भी राजस्थान के लोगों ने अकबर जोधा के रिश्ते को लेकर भ्रम पैदा किया। वहां के लोगों के अनुसार जोधा अकबर की पत्नी नहीं बहू थी। इस कारण उन्हें इस फिल्म से आपत्ति थी। पर सोचनीय बात यह है कि क्या आशुतोष ने इतनी बड़ी फिल्म का निर्माण करने से पहले इतनी जरूरी बात का ध्यान नहीं रखा होगा।
खैर, यह तो होना ही था। कोई भी बड़ी फिल्म बिना विवादों के घेरे से नहीं बच सकती। परन्तु यहां पर यह बताना भी बहुत जरूरी है कि फिल्म के जुड़े हर व्यक्ति ने अपना काम पूरी ईमानदारी से निभाया है। जोधा और अकबर के पहनाऐ गये आभूषणों और वेष भूषा का भी खासा ध्यान रखा गया है।
फिल्म का दूसरा मुख्य आर्कषण का केन्द्र इसका संगीत है। जो कि आजकल के भड़कीले और शोर शराबे वाले संगीत से बिल्कुल अलग है। इसके गीत शान्त और सकून देने वाले हैं। फिल्म का एक गाना ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा’ तो मजहब की दीवारों से ऊपर है और सकून भरा है।
इस फिल्म से जुड़ी हर बात प्रशंसा के काबिल है। इस फिल्म को देखकर अपने इतिहास के कई पहलुओं से रूबरू होने का मौका मिला। हम तो यही उम्मीद करते हैं कि हमारे बालीवुड के निर्देशक इस तरह की विषय वस्तु पर फिल्म बनाते रहें, ताकि आगे आने वाली पीढ़ी समय दर समय अपने सुनहरे इतिहास से मुखातिब हो सके।
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