बुधवार, 21 नवंबर 2007

छोटे शहरों की आंखों मे पल रहे हैं बड़े सपने


कहीं पढ़ा था कि शहर वह जगह है, जहां बिल्‍डर पहले तो पेड़ गिराते हैं और उनके नाम पर श‍हर की सड़कों का नाम करण करते हैं। और इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आगे आने वाला समय श‍हरों का है। खासकर भारत जैसे विकासशील देश में तो आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं। अभी किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक हमारे 11 शहर दुनिया के सबसे तेजी से विकसित हो रहे शहरों मे शामिल किये जा चुके हैं।पर इस से भी विशेष और हैरान करने वाली बात यह है कि इन 11 शहरों मे दिल्‍ली, मुम्‍बई जैसे किसी महानगर का नाम शामिल नहीं है। इस सूची मे जगह पाने वाले शहर वह हैं जिन्‍हें हम छोटे शहर के नाम से जानते हैं। इनमे कई नाम तो ऐसे हैं जिनका नाम भी आपने पहली बार सुना होगा। लेकिन यही सच है कि इन्‍हीं छोटे शहरों में विकास की धारा तेजी से बह रही है।

हालांकि इनमे से कई शहर औद्योगिक रूप से पहले से ही विकसित हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनकी आबादी मे जिस तेजी से बढ़ोतरी हुई है, वह अभूतपूर्व है। यदि इसी गति से शहरीकरण होता रहा, तो 2021 तक देश की आधी से ज्‍यादा आबादी श‍हरों में रहेगी। सिर्फ श‍हरों की संख्‍या ही नहीं बढ़ रही है, बल्कि उनके उपभोग के तरीकों और जीवनशैली में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। दैनिक जरूरतों से लेकर इंटरनेट तक का सबसे तेजी से विकास छोटे और गैर-मेट्रो शहरों मे हो रहा है।
देखा जाये तो इंटरनेट उपयोग करने वाले लोगों की गिनती में महानगर अब भी आगे है, लेकिन उपभोगकर्ताओं की संख्‍या मे बढ़ोतरी की दर के आधार पर अगर देखा जाये, तो छोटे शहर काफी आगे निकल गये हैं। वर्ष 2000 मे 14 लाख इंटरनेट इस्‍तेमाल करने वालों में मेट्रोवासियों की संख्‍या10 लाख से ज्‍यादा थी, जबकि 2007 में छह करोड़ उपयोगकर्ताओं में महानगरवासियों की संख्‍या सिर्फ 37 फीसदी है, शेष उपयोगकर्ता छोटे शहरों से हैं। दरअसल, बड़े शहरों और महानगरों में प्रापर्टी की अनुपलब्‍धता और ऊंची कीमतों और मंहगी मजदूरी के कारण कई उद्योग छोटे श‍हरों की ओर रूख कर रहे हैं। खासकर अर्थव्‍यवस्‍था में तेजी से बढ़ता हुआ सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग भी तेजी से छोटे शहरों की तरफ जा रहा है।
लेकिन जिस गति से हमारे यहां शहरीकरण हो रहा है, उसकी वजह से ढेरों समस्‍याऐं भी पैदा हो रही हैं। हमें आर्थिक विकास में तेजी तो दिख रही है, लेकिन पर्यावरण की रक्षा और बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिहाज से हमारे शहर काफी पिछड़े हुऐ हैं। छोटे शहर ही क्‍यों, इस मामले में तो हमारे महानगरों की हालत तो और खराब है। आज नही तो कल, बुनियादी सुविधाओं की कमी एक बड़ी बनकर उभरेगी।इसलिये यह बहुत जरूरी है कि समय रहते उन कमियों को दूर कर लिया जाऐ ताकि भविष्‍य की परेशानियों से बचा जा सके।

मंगलवार, 20 नवंबर 2007

बायो ईंधन का होगा जमाना


सारी दुनिया आजकल वैकल्पिक ईंधन की तलाश में जुटी हुई है, पर इधर जब से तेल की कीमतें चढ़ी हैं,इस बारे में और जोरों से विचार विमर्श शुरू हुआ है कि आखिर यह विकल्‍प क्‍या होगा। हमें सौर ऊर्जा की तरफ बढना चाहिये, एटमी विकल्‍प पर जोर आजमाइश करनी चाहियेया फिर उस बायो ईंधन के बारे में सोचना चाहिये, जिसका इस्‍तेमाल दुनिया के कई देश करने लगे हैं और जिसे हम लोग अपने खेतों में आसानी से उगा सकते हैं। पर्यावरण के अनूकूल होने की वजह से बायो ईंधन का आकर्षण भी बहुत है।पेट्रोल-‍डीजल की बढ़ती खपत एक तो ग्‍लोबल समस्‍या में इजाफा करके हमें प्रदूषण से भरे डरावने कल की ओर ले जा रही है, तो दूसरी ओर इसकी दिनोदिन बढती कीमत बायो ईंधन की जरूरत दर्शा रही है।

कहने को तो हाइड्रोजन, सौर ऊर्जा, एटमी एनर्जी, पवन ऊर्जा सरीखे तमाम विकल्‍प हो सकते हैं। पर जहां एटमी एनर्जी की अपनी दिक्‍कतें हैं, वहीं हाइड्रोजन ऊर्जा अभी जैव ईंधन की तरह कारगर नहीं है। सौर और पवन ऊर्जा जुटाने का तो इतना तामझाम है कि उनसे आज की जरूरतों के हिसाब से ऊर्जा हासिल करने की कोशिश हो, तो शायद पूरी दुनिया की जमीन सोलर और विंड एनर्जी के पैनलों और पंखों से ढ़क जाये। ऐसे में एक बड़ी उम्‍मीद गन्‍ना, मक्‍‍का से लेकर सोयाबीन, जटरोफा, रेपसीड, पाम और अन्‍य कई पेड़-पौधों से हासिल हो सकने वाले ईंधन से है, जिसे बायो ईंधन कहा जाता है। यह चूंकि एक पर्यावरण मित्र ईंधन है, इसलिये इसमें प्रत्‍यक्षत: कोई हानि नजर नहीं आती है।

परन्‍तु हर बात के दो पहलू अवश्‍य होते हैं। बायो ईंधन के खतरे भी हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे ईंधन का क्‍या लाभ, जो जंगलो का सफाया करवाते हुऐ पर्यावरण का नया संकट पैदा कर रहा है। और ऐसा भी बायो ईंधन क्‍या, जिसे हासिल करने के क्रम में हम अपने भोजन से भी वंचित रह जाऐं? बायो ईंधन हासिल करने के लिये इंडोनेशिया और मलेशिया मे पाम की रोपाई के लिये बड़े पैमाने पर जंगल काटे जा रहे हैं। खतरा यह भी यह है कि जिन अनाज फसलो का इस्‍तेमाल इंसान के भोजन के रूप में होता है, अगर उनका प्रयोग बायो ईंधन के रूप मे होने लगा, तो ऐसी फसलों-अनाजों की कीमतें कहां जाऐंगी? अमेरिका मे गत वर्ष मक्‍‍के की कीमत मे 50 फीसदी का इजाफा हुआ,तो सोयाबीन की कीमतों मे भी 30% तक की बढ़ोतरी होने की आशंका है। हांलाकि पूरी दुनिया मे एक सा माहौल नहीं है। जिन देशों मे गन्‍ने से एथेनांल हासिल किया जा रहा है, वहां दूसरी फसलों की कीमतें नहीं बढ़ रही।
अगर भारत की बात की जाये तो हमारे यहां गन्‍ने की भरपूर खेती है। यानि कि हमें एथेनांल के लिये अलग से खेती करने की जरूरत न‍ही। फिर बायो ईंधन के एक अन्‍य स्‍त्रोत जटरोफा की खेती के बंजी जमीनों के लिये की जा रही है। इसलिये भारत में तो फिलहाल को समस्‍या पैदा होती नजर नहीं आ रही है। दरअसल भारत मे खतरे दूसरी किस्‍म के हैं। पर्यावरणविद् बता रहे हैं कि बायो ईंधन के लिये जिन बंजर जमीनों की बात हो रही है, वे जमीने पूरी तरह से बंजर नहीं होती। कभी उन जगहों पर जंगल हुआ करते थे।जंगल साफ करने से जो सामान्‍य भूमि मिलती है, कायदे से उसका इस्‍तेमाल स्‍थानीय किसान अपनी विविध जरूरतों के लिये करते हैं।पर अगर दैनिक उपभोग की वे सभी चीजें वहां से हटा दी गयीं और केवल जटरोफा की पैदावार की जाऐं तो वहां की सामाजिक व्‍यवस्‍था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वस्‍तुत: हमें अगर अमेरिका की तरह अच्‍छी क्‍वालिटी के एथेनांल की आवश्‍यकता पड़ी, तो वह मक्‍के से ही मिलेगा।उससे ग्रीन हाउस गैस भी कम निकलती है। लिहाजा हमे जटरोफा और गन्‍ने की जगह बड़े पैमाने पर मक्‍का उगाना पड़ेगा।

गुरुवार, 15 नवंबर 2007

अंग्रेजी भाषा या आत्‍महत्‍या कौन सा विकल्‍प चुनेगें आप?


अगर मैं आपसे पूछूं कि आप कितनी भाषाओं का ज्ञान रखते हैं तो आप भले ही कितनी भाषाओं का नाम क्‍यों ना ले लें परन्‍तु कदाचित आपने अगर अंग्रेजी का नाम नहीं लिया तो समझिये कि आपका ज्ञान अधूरा और व्‍यर्थ है।यह ना समझियेगा कि यह विचार मेरे हैं।यह वह कड़वा सत्‍य है जिसे शायद बी टेक द्वितीय वर्ष का वह छात्र नहीं सहन कर पाया और अंग्रेजी ना जानने अपराध उसे आत्‍महत्‍या के अपराध से कहीं बड़ा जान पड़ा।पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के जौनपुर निवासी उस छात्र के इस मेधावी छात्र के इंजीनियर बनने के ख्‍वाब को अंग्रेजी भाषा की अज्ञानता ने चकनाचूर करके रख दिया।ऐसा ही कुछ इलाहाबाद के एक बैंककर्मी रामबाबू पाल के साथ हुआ।उन्होने भी अपने सुसाइड नोट में यही लिखा कि अंग्रेजी ना जानने के कारण उनके स‍हकर्मी उनका उपहास करते थे।जिस कारण वह हीन भावना से ग्रस्‍त थे।तो क्‍या यह मान लिया जाये कि अंग्रजी भाषा का अज्ञानता का अंतिम विकल्‍प केवल आत्‍महत्‍या है।क्‍या किसी भाषा को ना जानने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
कभी हमने सोचा कि ऐसा क्‍यों हुआ। आजादी की लड़ाई के समय महात्‍मा गांधी ने जिस हिन्‍दी को कभी सारे देश को एक सूत्र मे पिरोने का धागा समझा था वही हिन्‍दी आज अपने ही देश मे परायो सा अनुभव कर रही है।गांधी मानना था कि देश में शिक्षा का माध्‍यम हिन्‍दी होना चाहिये।परन्‍तु देश ने समय के साथ इसे भुला दिया।शायद इसका एक कारण यह भी था कि सारी नयी तकनीकी पुस्‍तकों को हिन्‍दी में उपलब्‍ध कराना पड़ता।जिसके लिये धन की जितनी आवयश्‍कता थी उससे ज्‍यादा जरूरत थी संकल्‍प शक्ति की।पर इसी संकल्‍प शक्ति की कमी ने नई पीढी के कई योग्‍य नौजवानों के लिये उन्‍नित के रास्‍ते बंद कर दिये।
60 से 70 के दशक मे जो लोग अंग्रेजी हटाओ का नारा दे रहे थे , धीरे-धीरे उन्‍हें यह बात समझ में आ गयी कि अंग्रेजी के बिना उनका गुजारा भी असंभव है।परिणाम यह हुआ कि शहर से लेकर गांवों तक अंग्रेजी माध्‍यम के स्‍कूलों के जाल से बिछ गये।नतीजा हिन्‍दी माध्‍यम के स्‍कूल और उसके छात्रों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ा।
अगर गौर किया जाये कि यदि हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था भारतीय भाषाओं मे आधुनिक ज्ञान की पुस्‍तकें उपलब्‍ध करा सकती तो,देश के कई योग्‍य व्‍यक्ति केवल इसलिये आत्‍महत्‍या नहीं करते कि वे अंग्रेजी नहीं जानते।