रविवार, 25 नवंबर 2007

कश्‍मीर: खूबसूरती ही बनी अभिशाप


सुना था कि कभी कभी किसी की सुन्‍दरता ही उसके पतन का कारण बन जाती है। कश्‍मीर की किस्‍मत भी शायद कुछ ऐसी ही रही है। आज मैं आपको कश्‍मीर की कहानी सुनाने जा रही हूं। कैसे कश्‍मीर दो देशों के बीच दुश्‍मनी का कारण बन गया और वह कौन लोग हैं जो इस विवाद को जन्‍मदाता थे? मेरी इस कहानी में शायद आपको आपके बहुत सारे प्रश्‍नों का उत्‍तर मिल जाऐ।

हिन्‍दुस्‍तान-पाकिस्‍तान के बंटवारे के तुरन्‍त बाद से पाकिस्‍तान किसी भी तरह जम्‍मू-कश्‍मीर पर अपना कब्‍जा चाहता था। इस उद्वेश्‍य को पूरा करने के लिये वह कश्‍मीर पर तीन बार 1947, 1965, 1971 और 1999 हमला भी कर चुका है।परन्‍तु हर बार हमले में विफल होने पर वह कश्‍मीर को अधिकार में लेने के लिये नई युक्तियों और तिकड़मों का सहारा ले रहा है।

बंटवारे के समय भारत के अंतिम गर्वनर जनरल और वाइसराय लार्ड लुई माउन्‍टबेन ने कश्‍मीर के तत्‍कालीन महाराजा को सलाह दी थी कि वह 15 अगस्‍त 1947 से पहले भारत या पाकिस्‍तान में से किसी एक में शामिल हो जाऐं। पर कश्‍मीर के राजा निर्धारित समय पर कोई फैसला नहीं ले सके। उन्‍होनें भारत और पाकिस्‍तान दोनो के साथ व्‍यापार, संचार और अन्‍य सेवाओं को पहले की तरह बनाऐ रखने के लिये यथास्थिति बनाऐ रखने का प्रस्‍ताव किया। पाकिस्‍तान ने प्रस्‍ताव को स्‍वीकार करते हुऐ उनके साथ यथास्थिति बनाऐ रखी। पर पाकिस्‍तान के इस समझौते को स्‍वीकार करने के पीछे भी बहुत बड़ा उदृदेश्‍य था। वह किसी भी तरह जम्‍मू-कश्‍मीर पर कब्‍जा करना चाहता था। इसके लिये उसने सबसे पहले समझौते का उल्‍लघंन करते हुऐ कश्‍मीर को आवश्‍यक वस्‍तुओं- खाद्यान्‍न, पेट्रोल, दवाई आदि की आपूर्ति रोकी और फिर उत्‍तर पश्चिम सीमा प्रान्‍त के अफरीदी कबाइलियों को जिहाद के नाम पर भड़का कर कश्‍मीर में रक्‍तपात, लूटपाट और आगजनी का सूत्र बनाकर भेजा। इन कबाइलियों को हथियार, गोलाबारूद और परिवहन की सुविधा के लिये पाकिस्‍तान ने उनके साथ अपनी सेना के कुछ अफसरों को कबाइली वेश-भूषा मे भेजा। इन कबाइलियों ने सियालकोट, श्रीनगर मार्ग मे बढ़ते हुऐ कश्‍मीर में रक्‍तपात और बलात्‍कार और आगजनी का ताण्‍डव नृत्‍य शुरू कर दिया। 23 अक्‍टूबर तक ये लोग श्रीनगर से केवल 30 मील दूर रह गये थे। रियासत की सेना और पुलिस पग पग पर उनका सामना कर रही थी। लेकिल कबाइलियों की विशाल संख्‍या के सामने वह कमजोर पड़ रही थी।

इस स्थिति में कश्‍मीर की जनता के जान माल की रक्षा के लिये कश्‍मीर के राजा हरि सिहं ने 26 अक्‍टूबर 1942 को भारतीय संघ मे विलय होने के पत्र पर हस्‍ताक्षर कर दिये। 27 अक्‍टूबर को भारतीय सेना श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरना और पाकिस्‍तानी हमलावरों को पीछे धकेलना शुरू कर दिया।
कश्‍मीर पर पाकिस्‍तान के इस अचानक और अकारण हमले के विरूद्ध भारत ने संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद मे शिकायत की। तब सुरक्षा परिषद ने दोनों पक्षों से 31 दिसम्‍बर 1948 से युद्ध विराम करने को कहा। इसी के साथ भारत-पाकिस्‍तान संयुक्‍त राष्‍ट्र आयोग ने अपने 13 अगस्‍त 1948 के प्रस्‍ताव के अंतर्गत पाकिस्‍तान से जम्‍मू कश्‍मीर से अपनी सेनाऐं, अनियमित लड़ाकों और बाहरी लोगों को वापिस बुलाने को कहा। साथ ही भारत को शांति बनाऐ रखने के लिये सेना रखने की अनु‍‍मति भी दी गयी।
क्‍या इसके बाद कश्‍मीर में सचमुच शांति बहाल हो गयी और कैसे कश्‍मीर का एक हिस्‍सा पाकिस्‍तान के कब्‍जे मे चला गया? इस रहस्‍य से हम कल पर्दा उठायेगें।आशा करती हूं कि आप मेरे साथ बने रहेंगें,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

शनिवार, 24 नवंबर 2007

हरे मोदी हरे गुजरात


आजकल भारतीय जनता पार्टी यह राग अलापते नजर आ रही है। और इस नवीन रचना के रचियता है नरेन्‍द्र मोदी। भाजपा यह अच्‍छी तरह से जानती है कि आने वाले गुजरात के विधानसभा चुनावों मे अगर कोई उन्‍हे जीत का सेहरा बंधा सकता है तो वह नरेन्‍द्र मोदी ही हैं। यह कहना गलत ना होगा कि आज नरेन्‍द्र मोदी का कद गुजरात से ऊंचा हो गया है। इस समय भाजपा मोदी के बगैर जीतना तो दूर चुनाव के मैदान में उतरने की भी नहीं सोच सकती।

गुजरात में अगले माह होने जा रहे विधान सभा चुनावों में स्थिति कुछ ऐसी बनी हुई है कि मैदान में एक तरफ नरेन्‍द्र मोदी हैं और दूसरी ओर बाकी सभी पार्टियां। और मोदी हर त‍रह से सब पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं। और इन सब के पीछे है गुजरात की जनता का वह विश्‍वास जो उन्‍होने अपने मुख्‍यमंत्री पर जताया है। वैसे गुजरात की जनता के मोदी पर भरोसा जताने के कारण भी हैं। वह मोदी ही हैं जिन्‍होनें गुजरात को देश का सबसे श्रेष्‍ठ राज्‍य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

जब 2001 में नरेन्‍द्र मोदी ने कार्यभार संभाला था तो उस समय पूरा प्रदेश जनवरी में आये भूकम्‍प की मार से ग्रस्‍त था। सूखे का प्रकोप कुछ ऐसा था कि सारा राज्‍य रेगिस्‍तान बनता जा रहा था। पर मोदी ने माली बनकर अपने इस उजड़े हुऐ बाग को फिर से सजाया संवारा। उन्‍होने राज्‍य में कई कुऐं खुदवाऐ, तालाबों का पुन:निमार्ण कराया। और उनकी मेहनत रंग लायी। आज मोदी का बगीचा फिर से हरा-भरा हो गया है। इतना कि देश के शेष सभी राज्‍यों के लिये वह मॉडल प्रदेश बन गया है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि नरेन्‍द्र मोदी एक सफल मुख्‍यमंत्री रहे हैं और अपने लक्ष्‍यों के प्रति उनमें अर्जुन जैसी निष्‍ठा भी है। उन्‍होनें गुजरात को आर्थिक रूप से काफी मजबूत किया है। उन्‍होने राज्‍य में बिजली, पानी, और बालिका शिक्षा जैसी समस्‍याओं को दूर करने के लिये बहुत मेहनत भी की है।

यहां तक कि भाजपा भी पूरी तरह से मोदी पर ही आस लगाये है। यह भी सच है कि मोदी के पार्टी से हटते ही भाजपा रेत के टीले की तरह ढ़ह जाऐगी।एक कड़वा सच यह भी है कि नरेन्‍द्र मोदी के शत्रुओं की गिनती दूसरे दलों के साथ साथ स्‍वयं भाजपा में भी है।परन्‍तु वह एक सफल रणनीतिकार हैं और अपने शत्रुओं के फन को कुचलना वह अच्‍छी तरह जानते हैं। ठीक चुनाव से पहले उनके लिये उनके शत्रुओं ने उनके लिये कई तरह की समस्‍याऐं पैदा करने को तमाम कोशिशें भी की पर नरेन्‍द मोदी के जादू के सामने सब कुछ व्‍यर्थ रहा। वह सचमुच किसी जादूगर से कम नहीं हैं।

वर्तमान परिदृश्‍य से तो यही संकेत मिल रहे हैं कि नरेन्‍द्र मोदी मजबूत स्थिति में है और कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि मोदी अपने दम पर गुजरात में चुनाव जीतने की हिम्‍मत रखते हैं। अपनी पार्टी से ना ही वह कोई उम्‍मीद रखते है और ना ही कोई आशा। और यदि वह अपनी जीत के प्रति आश्‍वस्‍त हैं तो इसका श्रेय भी उनके द्वारा किये गये विकास कार्यों को जाता है।

गुरुवार, 22 नवंबर 2007

एक बार फिर हुई मानवता शर्मसार


अभी कुछ दिनों पहले एक ऐसी खबर पढ़ने में आयी जिसे पढ़कर मेरी पलकों ने कुछ सेकेण्‍ड के लिये झपकना बंद कर दिया।मानव जाति का इतना घिनौना रूप मैनें आज से पहले कभी नहीं देखा था। खबर थी कि पश्चिम बंगाल के एक छोटे से राज्‍य किसयझियौरा में एक अफजुद्वीन नामक एक आदमी ने दूसरी शादी कर ली।और वह भी अपनी ही सगी बेटी के साथ। इस बात का राज सबके सामने तब खुला जब लोगों को पता चला कि उसकी लड़की पांच माह की गर्भवती है। मानवीय रिश्‍तों का इससे बड़ा अपमान तो हो ही नहीं सकता। और उससे भी शर्मनाक बात यह है कि उसकी पहली पत्‍नी और उस लड़की की मां अभी तक जिन्‍दा है और उसे इस बात में कोई बुराई नजर नहीं आती। उसका कहना है कि उसका पति एक धार्मिक आदमी है और वह ऐसा कोई काम नहीं कर सकता जो अल्‍लाह की मर्जी के खिलाफ हो। परन्‍तु उसके गांव वाले उसे खासे नाराज हैं और उन्‍होने उसके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कर दी है।

कहने को तो हम एक आधुनिक युग में जी रहे हैं और एक सभ्‍य समाज के सदस्‍य होने का दावा भी करते हैं। पर जब इस तरह की घटनाऐं सामने आती हैं तो हमारे सारे दावे खोखले और बनावटी नजर आते हैं। इसका एक सबसे बड़ा कारण जो मुझे नजर आता है वह यह कि हम आगे तो बढ़ रहे हैं पर एक जुट होकर नहीं। अर्थात हमारे देश में समाज का एक वर्ग जो कि शिक्षित है आगे बढ़ रहा है उसकी सोच भी बदल रही है परन्‍तु दूसरा वर्ग जो कि अभी भी शिक्षा से कोसों दूर है,वहीं खड़ा हुआ है जहां आज से 50-100 साल पहले खड़ा था। उसकी पुरानी मान्‍यताऐं और रूढ़ीवादी सोच ज्‍यों कि त्‍यों है। उसकी नजरों में स्‍त्री आज भी केवल उपभोग की वस्‍तु है।
हमारा आधुनिक समाज और इसके सभ्‍य लोग सुनीता विलियम्‍स के भारतीय स्‍त्री होने पर गर्व तो करता है और उसके सम्‍मान में ताली भी बजा सकता है परन्‍तु देश में हो रही कन्‍या भ्रूण हत्‍या के खिलाफ अंगुली उठाने में कतराता है। और अपने ही घर में कन्‍या पैदा होने पर भी उसे कोई खास खुशी नहीं होती।
हमारा पढ़ा-लिखा समाज में कहीं ना कहीं आज भी पुरानी मान्‍यताऐं जीवित हैं। इसे हम एक छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं। हमारे समाज में यदि कोई व्‍यक्ति जब अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिये धन बचत सम्‍बन्‍धी कोई योजना अपनाता है तो वह योजना सदैव बेटी के लिये उसके विवाह से और बेटे के लिये सदैव उसकी पढ़ाई से जुड़ी होती है।क्‍या बेटियों की शिक्षा के लिये धन नहीं जोडा जा सकता।
इसी तरह और भी कई मसले हैं जो सुलझाये जाने बहुत आवश्‍यक हैं।यदि हम सही मायनों मे उन्नित करना चाहते हैं तो इस तरह की घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाना अतिआवश्‍यक है। लोगों की इस तरह की गलत और रूढ़ीवादी विचार धारा को बदले जाने के लिये हमारे समाज के हर तबके को जागरूक करना बहुत जरूरी है जिसके लिये सर्व जन शिक्षा को प्राथमिकता दिया जाना आवश्‍यक है। ताकि हमें भविष्‍य में इस तरह की अमानवीय घटनाओं से पुन: रूवरू ना होना पड़े।